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    विज्ञान भैरव तंत्र - विधि 65

    [ "अन्य देशनाओं के लिए जो शुद्धता है वह हमारे लिए अशुद्धता ही है . वस्तुतः किसी को भी शुद्ध या अशुद्ध की तरह मत जानो ." ]

    तंत्र कहता है कि अस्तित्व अखंड है , अस्तित्व एक है . और जो द्वंद्व हैं वे सब--स्मरण रहे , सब के सब--मनुष्य के बनाए हुए हैं . द्वंद्व मात्र मनुष्य-निर्मित हैं ; शुभ-अशुभ , शुद्ध-अशुद्ध , नैतिक-अनैतिक , पुण्य-पाप , ये सारी धारणाएं मनुष्य ने निर्मित की हैं . ये मनुष्य की मान्यताएं हैं , ये यथार्थ नहीं हैं . क्या अशुद्ध है और क्या शुद्ध , यह तुम्हारी व्याख्या पर निर्भर है . वैसे ही क्या अनैतिक है और क्या नैतिक , यह भी तुम्हारी व्याख्या पर निर्भर है .

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