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    चेतना के प्रतिक्रमण का रहस्य-सूत्र - ओशो

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    चेतना के प्रतिक्रमण का रहस्य-सूत्र - ओशो 

    अंधकार बाहर ही है। भीतर तो सदा ही आलोक है। ध्यान बहिर्गामी है तो रात्रि है। ध्यान अंतर्गामी बने तो रात्रि दूर हो जाती है, और सुबह का जन्म हो जाता है। बाहर से हटाएं मन को। मुड़ें भीतर की ओर। शब्द से न रहें—मौन हो। विचार से विश्राम लें— शून्य हो। बाह्य को भूलें और स्मरण करें उसका जो भीतर है। जब भी समय मिले— चेतना की धारा को भीतर की ओर ले चलें। सोते समय—सोने के पूर्व आंखें बंद करें और भीतर देखें। जागते समय—ज्ञात हो कि नींद टूट गयी है तो आंखें न खोलें—पहले देखें भीतर। और धीरे-धीरे चेतना के क्षितिज पर सूर्योदय हो जाएगा। और जिसके भीतर प्रकाश है, फिर उसके बाहर भी अंधकार नहीं रह जाता है।

     - ओशो 

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