सत्य को पाने की पहली शर्त अभय है- ओशो
सत्य को पाने की पहली शर्त अभय है- ओशो
बूढ़ों का विश्वास कोई कीमत नहीं रखता। साहस जैसे-जैसे कम होता जाता है, विश्वास को पकड़ लेते हैं, भय के कारण, सुरक्षा के लिए, डर के कारण, मृत्यु के बाद न मालूम क्या होगा? अगर नहीं स्वीकार किया तो न मालूम किन नर्क में पीड़ा भोगनी पड़ेगी। अगर परमात्मा को नहीं माना, परमात्मा न मालूम क्या बदला ले, यह भय जैसे-जैसे घना होता है वैसे-वैसे आदमी विश्वास करने लगता है। और जो कमजोर है, वह सत्य को उपलब्ध नहीं हो सकता। विश्वास आपके किसी न किसी रूप में भय पर, घबड़ाहट पर, डर पर खड़ा हुआ है। और जो डरा हुआ है, भयभीत है, वह सत्य को कैसे पा सकेगा। सत्य को पाने की पहली शर्त तो अभय है। उसे पाने की पहली बुनियाद तो भय को छोड़ देना है।
लेकिन हमारे धर्म, हमारे संप्रदाय, हमारे पुरोहित, हमारे पादरी, हमारे धर्म गुरु, हमारे संन्यासी भय सिखाते हैं। उनके भय सिखाने के पीछे जरूर कोई कारण है। छोटे-छोटे बच्चों के मनों में भी हम भय को भर देते हैं, और छोटे-छोटे बच्चों के मनों में भी हम श्रद्धा को पैदा करना चाहते हैं। इसके पहले कि वे विचार में सजग हो सकें, हम किसी तरह के विश्वास में उनको आबद्ध कर देना चाहते हैं। दुनिया के सारे धर्म, बच्चों के साथ जो अनाचार करते हैं, उससे बड़ा कोई अनाचार नहीं है। इसके पहले कि बच्चे की जिज्ञासा जाग सके, वह पूछे कि क्या है, हम उसके दिमाग में वे बातें भर देते हैं जिनका हमें भी कोई पता नहीं है।
हम उसे हिंदू, मुसलमान, जैन या ईसाई बना देते हैं। हम उसे कुरान या बाइबिल या गीता रटा देते हैं। हम उसे कह देते हैं, ईश्वर है या ईश्वर नहीं है। फिर यही विश्वास जीवन भर कारागृह की तरह उसकी चेतना को बंद किए रहेंगे। यह वह कभी साहस नहीं कर सकेगा कि सत्य को जान सके। बच्चों के साथ, अगर मां-बापों को, धार्मिक गुरुओं को, अभिभावकों को प्रेम हो, तो उन्हें पहला काम करना चाहिए कि उन्हें अपना प्रेम तो दें, लेकिन अपने विश्वास न दें, अपनी श्रद्धाएं न दें, अपने विचार न दें। उन्हें उन्मुख रखें, उनकी जिज्ञासा को जगाएं, लेकिन उनकी जिज्ञासा को समाप्त न करें।
श्रद्धा जिज्ञासा को तोड़ देती है और नष्ट कर देती है। हम सारे लोग ऐसे ही लोग हैं, जिनकी जिज्ञासाएं बचपन में तोड़ दी गयी हैं, और जो किसी न किसी तरह की श्रद्धा, अपने किसी न किसी तरह के विश्वास, किसी न किसी तरह के बिलीफ को पकड़ के बैठ गए हैं। वह विश्वास ही हमें ऊपर नहीं उठने देता। वह विश्वास ही हमें विचार करने देता। वह विश्वास कहीं गलत न हो, इसलिए हमें जिज्ञासा नहीं करने देता।
- ओशो
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