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    धर्म सबसे बड़ा विद्रोह है - ओशो

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    धर्म सबसे बड़ा विद्रोह है - ओशो 

              दुनिया में जब भी कोई धार्मिक आदमी पैदा होता है तो पुरोहित और ब्राह्मण और पंडित हमेशा उसके विरोध में खड़े हो जाते हैं। क्राइस्ट को जिन्होंने सूली दी वे पुरोहित, पंडित और धार्मिक लोग थे। सुकरात को जिन्होंने दिया जहर वे धार्मिक, पुरोहित, विचारशील लोग पंडित थे। दुनिया में हमेशा पंडित धार्मिक आदमी के विरोध में रहा, दुनिया में हमेशा हर धार्मिक आदमी के विरोध में रहा है। क्योंकि धार्मिक आदमी सबसे पहले इस बात पर चेष्टा करेगा कि धर्म के नाम पर बना हुआ जो भी प्रचारित संगठन है, धर्म के नाम से जो भी धार्मिक संप्रदाय है, धर्म के नाम पर जो भी झूठे विश्वास, अंधश्रद्धाएं फैलायी गयी हैं, वे नष्ट कर दी जाएं। अगर फिर से क्राइस्ट पैदा हों तो सबसे पहले जो उनके विरोध में खड़े होंगे, वह ईसाई पुरोहित और पादरी होंगे। अगर कृष्ण फिर से पैदा हों तो सबसे पहले उनके विरोध में जो खड़े होंगे वे, वे ही लोग होंगे जो गीता का प्रचार करते हैं और गीता को प्रचारित हुआ देखना चाहते हैं। अगर बुद्ध वापस लौटें तो बौद्ध भिक्षु उनके विरोध में खड़े हो जाएंगे। यह बिल्कुल स्वाभाविक है, क्योंकि धर्म एक तरह का विद्रोह है। धर्म सबसे बड़ा विद्रोह है, सबसे बड़ी क्रांति है, और वह क्रांति इस बात से शुरू होती है कि श्रद्धा नहीं, हम जिज्ञासा करें।

    सत्य पर विश्वास न लाएं, क्योंकि अभी आपको सत्य पता ही नहीं है, जिस पर आप विश्वास लाएंगे। अभी तो दूसरे जो आपसे कहते हैं, उसी पर ही आप विश्वास कर लेंगे। उसके सत्य और असत्य होने का कुछ भी पता नहीं है। सब विश्वास अंधे होते हैं। क्योंकि वे दूसरे आपको देते भी अभी आप मांगते हैं, वह किसी दूसरे ने आपको दिया है। आपको कुछ भी पता नहीं कि वह ठीक है या गलत है। सिवाय इसके कोई प्रमाण नहीं है कि हमारे मां-बाप ने उसे दिया है। जो परंपरा से उपलब्ध होता है, वह कभी सत्य होने की संभावना रही है। जो स्वयं की निज खोज से उपलब्ध होता है वही सत्य होता है और इसलिए सत्य प्रत्येक को स्वयं पाना होगा। दूसरे से उधार पाने का कोई भी उपाय नहीं है। फिर जितनी गहरी श्रद्धा होगी, उतना ही आपके भीतर विवेक का जागरण असंभव हो जाएगा। जितना तीव्र विश्वास होगा, उतना ही विवेक क्षीण हो जाएगा, क्योंकि विश्वास विवेक-विरोधी है।

    वह हमेशा कहता है मानो। वह यह कभी नहीं कहता, जानो। वह हमेशा कहता है स्वीकार करो। वह यह कभी नहीं कहता, खोजो। वह हमेशा यह कहता है कि इसको बांध लो मन में, इससे भिन्न न सोचना। इससे अन्य मत सोचना, इसके विपरीत मत सोचना। जितनी श्रद्धा गहरी होगी, उड़ना उतना मुश्किल हो जाएगा।

    - ओशो

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