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    Osho Hindi Pdf- Kan Thore Kankar कन थोरे कांकर घने

    Osho Hindi Pdf- Kan Thore Kankar

    कन थोरे कांकर घने

    मलूकदास पियक्कड़ हैं। उनके शब्द-शब्द में शराब है, उनके शब्द-शब्द में रस है; अगर तुम डूबे तो उबर जाओगे। तो समझने की चेष्टा कम करना, पीने की चेष्टा ज्यादा करना। बुद्धि से संबंध मत जोड़ना। मलूकदास का बुद्धि से कुछ लेना-देना नहीं है। सरल बालक की भांति उनके वचन हैं। उनका एक ही वचन लोगों का पता है, शेष वचनों का कोई स्मरण नहीं है। वह वचन बहुत प्रसिद्ध हो गया है उसकी बड़ी गलत व्याख्या हो गई। अजगर करै न चाकरी, पंछी करै न काम। दास मलूका कहि गया, सबके दाता राम।। यह खूब प्रसिद्ध हुआ--गलत कारणों से प्रसिद्ध हुआ। आलसियों ने प्रसिद्ध कर दिया। जिन्हें भी काम से बचना था, उन्हें इसमें आड़ मिल गई। 

    आदमी बड़ा बेईमान है। मलूक का अर्थ कुछ और ही था। मलूक यह नहीं कह रहे हैं कि कुछ न करो। यह तो कह ही नहीं सकते हैं। मलूक यह कह रहे हैं कि परमात्मा को करने दो--तुम न करो। अजगर करै न चाकरी--सच है। किसने अजगर को नौकरी करते देखा? लेकिन अजगर भी सतत काम में लगा रहता है। पंछी करै न काम--सच है। पंछी दफ्तर में क्लर्की नहीं करते, न मजिस्ट्रेट होते, न स्कूलों में मास्टरी करते, न दुकान चलाते हैं। लेकिन काम में तो चौबीस घंटे लगे रहते हैं। सुबह सूरज निकला नहीं कि पंछी काम पर निकले नहीं। सांझ सूरज ढलेगा, तब काम रुकेगा। अर्जित करेंगे दिन भर, तब रात विश्राम करेंगे। 

    काम तो विराट चलता है। काम तो छोटी-छोटी चींटी भी करती है। काम से यहां कोई भी खाली नहीं है। फिर क्यों कहा होगा मलूक ने "अजगर करै न चाकरी, पंछी करै काम' ? मलूक का अर्थ है: इस काम में कहीं कर्ता का भाव नहीं है; "मैं कर रहा हूं, ' ऐसी कोई धारणा नहीं है। जो परमात्मा कराये! जिहि विधि राखै रास! जो करा लेता है, वही कर रहे हैं। करने वाला वह है, हम सिर्फ उपकरण मात्र है। दास मलूका कहि गया, सबके दाता राम। तो न तो हम कर्ता हैं, न हम भोक्ता है। न हम कर्ता हैं और न हम करने में सफल या असफल हो सकते हैं। वही करता है--वही हो सफल, वही हो असफल। ऐसी जिसकी जीवनदृष्टि हो, उसके जीव में तनाव न रह जायेगा, चिंता न रह जायेगी। 

    यह सूत्र तनाव को मिटाने का सबसे बड़ा सूत्र है। यह सूत्र काफी है--मनुष्य के जीवन से सारी चिंता छीन लेने के लिए। चिंता ही क्या है? चिंता एक ही है कि कहीं मैं न हार जाऊं। चिंता एक ही हैं कि कहीं और कोई न जीत जाए। चिंता एक ही हैं कि मैं जी पाऊंगा पा नहीं? चिंता एक ही है कि कोई भूल-चूक न हो जाए। चिंता एक ही है जिस मंजिल पर निकला हूं, वह मुझे मिलकर रहे। जिसने समझा। "सबके दाता रात', उसकी सारी चिंता गई। अहंकार गया, तो चिंता गई। कर्ता का भाव गया, तो बेचैनी गई। फिर चैन ही चैन है। फिर असफलता में भी सफलता.......................


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