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    अहंकार से ज्यादा हिंसात्मक कुछ भी नहीं - ओशो

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    अहंकार से ज्यादा हिंसात्मक कुछ भी नहीं - ओशो 

    अहंकार से ज्यादा हिंसात्मक, वायलेंट और कुछ भी नहीं है। अहंकार की पूर्ति के लिए किए गए काम सृजनात्मक नहीं रह जाते। अहंकार के द्वारा, ईगो के द्वारा मैं की तृप्ति के लिए, मैं कुछ हूं, दिखाई पड़े, उसके लिए जो कुछ किया जाता है, वह सृजन नहीं है। सृजन तो तभी है जब मैं भूल जाता, तब मैं कोई भी नहीं रह जाता। रवींद्रनाथ मर रहे थे। और उसने पूछा कि रवि बाबू, आपके छह हजार गीत गाए। अब तक मनुष्य जाति में किस कवि ने गीत नहीं गाए, जो संगीत में बांधे जा सकें। शैली, जो कि महाकवि है, उसके भी दो हजार सानेट हैं, जो संगीत में बांधे जो सकते हैं। रवींद्रनाथ ने छह हजार गीत गाए, जो सभी संगीत में बद्ध हो सकते हैं। किसी मित्र ने पूछा, मरते वक्त रवींद्रनाथ को, आपने छह हजार गीत गाए। रवींद्रनाथ ने कहा, क्षमा करो। जब उन्हें गाता था, तब मैं मौजूद ही नहीं था। जब वे पैदा हुए, तब मैं नहीं था। बाद में मैं उनसे जुड़ गया, लेकिन जब वे पैदा हुए, तब मैं बिल्कुल भी नहीं था। जब मैं बिल्कुल मिट जाता था और भूल जाता था, जब मुझे स्मरण भी नहीं रहता था कि मैं कौन हूं, तब उसका जन्म हुआ। तब वे मेरे भीतर से गाए और फैले, इसलिए मेरा... हां, कोई भूल-चूक हुई होगी तो मेरी होगी। लेकिन गीत परमात्मा के हैं, मेरे नहीं हैं।

    जिसने भी जीवन में कुछ सृजन किया है, उसे सदा ऐसा लगेगा कि वह उससे आया, लेकिन उसका नहीं है। वह रास्ता बना, कोई चीज उससे पैदा हुई, लेकिन वह उसकी नहीं है। अहंकार की छाप और हस्ताक्षर उस पर नहीं होंगे। जहां-जहां अहंकार जुड़ जाता है, वहीं-वहीं सृजन भी विनाशात्मक हो जाता है। इसीलिए तो इतने सारे मंदिर हैं दुनिया में, इतनी मस्जिद हैं, इतने चर्च हैं, लेकिन मंदिर, मस्जिद और चर्च अगर सृजन से पैदा होते तो मनुष्य की दुनिया में प्रेम भर गया होता। लेकिन मंदिर और मस्जिद और चर्च घृणा से पैदा हुए तो घृणा के अड्डे बने हुए हैं। इनसे ज्यादा खतरनाक तो अड्डे नहीं हैं दुनिया में। इन्होंने तो मनुष्य को लड़ाने में और हत्या करवाने में भाग लिया। निश्चित ही यह प्रेम से पैदा नहीं हुए होंगे। निश्चित ही यह अहंकार से आए होंगे और अहंकार लड़ाता है, इसलिए मंदिर और मस्जिद लड़ते हैं। वह अहंकार पर निर्मित हैं। उनके भीतर सृजनात्मक पवित्रता, सृजनात्मक प्रेम प्रकट नहीं हुआ।

    - ओशो

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