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    हमसे जो आत्मिक रूप से निम्नतम हैं, वे राजनीति में श्रेष्ठतम हो जाते हैं - ओशो

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    हमसे जो आत्मिक रूप से निम्नतम हैं, वे राजनीति में श्रेष्ठतम हो जाते हैं - ओशो

    हम बड़े संकट से गुजरे रहे हैं। और तब से अब तक कोई बीस लाख वर्ष हुए, मनुष्य जाति और बड़े और बड़े संक टों से गुजरती रही है। यह वचन सदा के लिए सत्य हो गया। ऐसा कोई समय न र हा, जब हम संकट में न रहे हों, और संकट रोज बढ़ते चले गए हैं। एक दिन अदम को स्वर्ग के राज्य से निकाला गया था, धीरे-धीरे हम कब के राज्य में प्रविष्ट हो गए, उसका भी पता लगाना कठिन है। आज तो यह कहा जा सकता है, इधर तीन हजार वर्षों का इतिहास ज्ञात है। तीन हजार वर्षों में साढ़े चार हजार युद्ध हुए हैं। यह घबड़ाने वाली और आश्चर्य कर देने वाली बात है। तीन हजार वर्षों में मनुष्य ने साढ़े चार हजार लड़ाइयां लड़ी हों तो यह तो जीवन शांति का जीवन नहीं कहा जा सकता। अब तक हमने कोई शांति काल नहीं जाना है। 

    दो तरह के हिस्सों में हम मनुष्य के इतिहास को बांट सकते हैं -युद्ध का समय, और युद्ध के लिए तैयारी का समय। शांति का कोई समय, कोई खंड अभी तक ज्ञात नहीं है। निश्चित ही, कोई बहुत गहरी विक्षिप्तता, कोई बहुत गहरा पागलपन मनुष्य को पकड़े होगा। कोई रास्ता अब खोज लेना जरूरी है। पुरानी लड़ाइयां बहुत छोटी लड़ाइयां थी और उनके बाद भी हम बचते चले आए हैं।  अब शायद जो युद्ध होगा, उसमें मनुष्य को बचने की सम्भावना भी नहीं है। 

    अल्बर्ट आइंस्टीन से मरने के पहले किसी ने पूछा, तीसरा महायुद्ध में किन शास्त्रों क उपयोग होगा? आइंस्टीन ने कहा, तीसरे के प्रति कहना कठिन है, लेकिन चौथे के संबंध में कहा जा सकता है। सुनने वाला, पूछने वाला हैरान हुआ। उसने पूछा चौथे में किन शास्त्रों का उपयोग होगा? अगर मनुष्य बचा रहा-क्योंकि बचने की कोई संभावना नहीं है, अगर बचा रहा, तो फिर से पत्थर के हथियारों से लड़ाई शुरू कर नी पड़ेगी। चूंकि तीसरा महायुद्ध, बहुत संभावना इस बात की है कि सारी मनुष्य जाति को ही नहीं, बल्कि समस्त जीवन मात्र को समाप्त कर दे। पिछले महायुद्ध में पांच करोड़ लोगों की हत्या हुई। पांच करोड़ लोग छोटी संख्या न हीं है। दोनों पिछले युद्धों में मिलाकर दस करोड़ लोग मारे गए। शायद हमें खयाल भी नहीं है कि इन दस करोड़ लोगों की हत्या करने में हमारा भी हाथ है। हम जो यहां बैठे हैं, हम जिम्मेदार है। कोई भी मनुष्य इस जिम्मेदारी और उत्तरदायित्व से बच नहीं सकता। जो भी जमीन पर हो रहा है, उस सब में हमारे हाथ हैं। दो महा युद्ध हमारे भीतर से पैदा हुए और हमने इतनी बड़ी हत्या की । और अब तो हमार " तैयारी बहुत बड़ी है। मैं उस तैयारी के संबंध में भी दो शब्द कहना चाहूंगा। 

    १९४५ में हिरोशिमा और नागासाकी पर जो अणु बम गिराए गए, वे बहुत घातक थे। एक लाख के करीब लोग उन अणु बमों के गिराने से नष्ट हुए। इधर बीस वर्षों में बहुत विकास हुआ है और हिरोशिमा पर जो बम गिराया गया था, बच्चों के खिलौनों से ज्यादा नहीं है। अब हमारे पास उससे बहुत शक्तिशाली बम हैं। ऐसे हाइड्रोजन बम कोई चालीस हजार वर्ग मील घेरे के समस्त जीवन को नष्ट कर सकता है। और ऐसे हाइड्रोजन बमों की संख्या हमारे पास में १९६० में पचास हजार थी। नि श्चित ही छह वर्षों में यह संख्या और बहुत ज्यादा बढ़ गयी होगी, हम रुके नहीं हैं। पचास हजार हाइड्रोजन बम क्या अर्थ रखते हैं, शायद आपको खयाल न हो। यह जमी न बहुत बड़ी पचास हजार हाइड्रोजन बमों को नष्ट करने के लिए यह जमीन छोटी है। इस तरह की सात जमीनें हों तो पचास हजार हाइड्रोजन बम उन्हें नष्ट क र सकेंगे। 

    अभी आदमी की संख्या कोई तीन अरब है। इक्कीस अरब आदमियों को मारने के लिए हमारे पास व्यवस्था है। यह थोड़े हैरानी की बात है कि इतनी बड़ी व्यवस्था से हम क्या करेंगे। शायद यह डर हो कि कोई आदमी मरने से बच जाए तो उसे दुबारा मारा जा सके, तीसरी बार मारा जा सके या सात बार मारा जा सके। हालांकि भगवान का कुछ ऐसा इंतजाम है कि एक आदमी एक ही बार में मर जा ता है, लेकिन फिर भी सात बार मरने का हमने इंतजाम कर रखा है कि कोई बच जाए, कोई अपवाद हो जाए तो व्यवस्था पूरी होनी जरूरी है। यह पचास हजार उद जन बस किसी भी दिन, किसी भी एक पागल राजनीतिज्ञ के दिमाग में खराबी आ जाने से खतरा बन सकते हैं। कोई एक आदमी का दिमाग खराब हो जाए तो सार " मनुष्य जाति नष्ट सकती है। 

    और जैसे हमारे दिमाग हैं, हम करीब-करीब वैसे ही पागल हैं, इसलिए पागल होने की कोई बहुत ज्यादा जरूरत नहीं है। आम आदमी इतना अशांत है, इतना दुखी है, इतना परेशान है कि उसके द्वार बहुत डर है कि वह कभी भी युद्ध के खतरे को मोल ले सकता है। हम छोटी-छोटी बात पर लड़ने को तैयार हो जाते हैं, बहुत छोटी-छोटी बात पर लड़ने को तैयार हो जा ते हैं, बहुत छोटी-छोटी बातों पर, और हमारे भीतर से हमारा राजनीतिज्ञ भी पैदा होता है। उसकी बुद्धि भी हमसे ज्यादा बड़ी और हमसे श्रेष्ठ नहीं होती है। उसकी आत्मा भी हमसे ज्यादा विकसित नहीं होती है। 

    अक्सर तो यह होता है, जो हमसे निम्नतम है, वे राजनीति में श्रेष्ठतम हो जाते हैं, और तब, तब खतरा और भी बढ़ जाता है। राजनीतिज्ञों के हाथ में दुनिया का होना एक ज्वालामुखी के ऊपर जैसे हम बैठे हों, ऐसी स्थिति में है। क्या आपको पता है, की आज्ञा से हिरोशिमा और नागासाकी में एटम बम गिरा। दूसरे दिन सुबह पत्रकारों ने ट्रमेन से पूछा, आप रात को ठीक से सो सके? एक लाख आदमी मर गए थे, स्वाभाविक था कि की नींद रात में खराब हुई , लेकिन उसने कहा, मैं बहुत आनंद से सोया। सच तो यह है, उसने कहा, इधर तीन चार वर्षों में इतनी शांति से मैं कभी नहीं सोया। एक लाख आदमियों को मार कर अगर हमारे राजनीतिज्ञ शांति से सो सकते हैं तो इन राजनीतिज्ञों के हाथ में दुनिया का होना शुभ नहीं कहा जा सकता। 

    - ओशो

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