धर्म हमेशा एक क्रांति से उपलब्ध होता है - ओशो
धर्म हमेशा एक क्रांति से उपलब्ध होता है - ओशो
धर्म हमेशा क्रांति से उपलब्ध होता है, क्रम से, ग्रेजुअल नहीं उपलब्ध होता है। धर्म धीरे-धीरे उपलब्ध नहीं होता, धर्म हमेशा एक क्रांति से उपलब्ध होता है। जो सोचते हैं, हम धीरे-धीरे धार्मिक हो जाएंगे, वे गलती में हैं। हिंसक सोचता हो, मैं धीरे-धीरे अहिंसक हो जाऊं तो गलती में है। घृणा करने वाला सोचता हो कि मैं धीरे-धीरे प्रेम से भर जाऊं तो गलती में है। अंधकार मिटाने वाला सोचता हो कि मैं धीरे-धीरे अंधकार को मिटा लूं तो गलती में है। जब प्रकाश जलता है तो अंधकार एक ही क्षण में विलीन हो जाता है और जब प्रेत जाग्रत होता है तो घृणा एक ही क्षण में विलीन हो जाती है और जब अहिंसा आती है तो हिंसा एक ही क्षण में छूट जाती है। जीवन में जो भी महत्त्वपूर्ण है वह एक ही क्षण में घटित होता है, क्रमशः घटित नहीं होता। जो भी क्रमशः घटित होता है, वही व्यर्थ और क्षुद्र है। जो एक ही साथ, जैसे क्रांति घटित होती है वही मूल्यवान, वही सार्थक, वही अर्थपूर्ण है और वही व्यक्ति को परमात्मा से जोड़ती है।
कोई व्यक्ति धीरे-धीरे संसार से दूर होकर परमात्मा को उपलब्ध नहीं होता। जब भी परमात्मा को कोई व्यक्ति उपलब्ध होता है तो एक छलांग में, एक क्रांति में, एक विस्फोट में उपलब्ध होता है और एक ही साथ तब कुछ परिवर्तित हो जाता है। जैसे हम किसी सोते व्यक्ति को उठा दें, तो वह धीरे-धीरे उठता है? नींद धीरे-धीरे टूटती है? जैसे हम किसी को उठा दें, एक क्रांति हो जाती है, सपने टूट जाते हैं और जागरण सामने आ जाता है। धर्म का जीवन भी क्रांति का जीवन है और इसलिए जो लोग धीरे-धीरे का खयाल करते हों, वह गलती में हैं और धीरे-धीरे का खयाल हमारी आलस्य की ईजाद है। हम असल में चाहते नहीं क्रांति, इसलिए कहते हैं, धीरे-धीरे।
- ओशो

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