संदेह इस जगत में सबसे बड़ा साहस है -ओशो
संदेह इस जगत में सबसे बड़ा साहस है -ओशो
हम सुनते हैं, विश्वास करो। साधारणतः हम सुनते हैं गीता कहती हो, कुरान कहता हो, बाइबिल कहती हो, उसे मान लो। हम सुनते हैं बुद्ध, महावीर, मोहम्मद, क्राइस्ट या कृष्ण जो कहते हैं, उसे स्वीकार कर लो। और जो स्वीकार नहीं करेगा, वह भटक जाता है। मैं आपसे यह कहना चाहता हूं, जो स्वीकार कर लेता है, वह भटक जाता है। इसलिए भटक जाता है कि जो भी दूसरे के सत्यों को स्वीकार कर लेता है, वह अपने सत्य की खोज से वंचित हो जाता है। चाहे वह सत्य कृष्ण का हो, चाहे बुद्ध का, चाहे महावीर का। अगर उस उधार सत्य को स्वीकार कर लिया तो आपकी अपनी खोज बंद हो जाएगी, आपका अपना अन्वेषण बंद हो जाएगा। आप रुक जाएंगे, ठहर जाएंगे। आपका अपना विकास समाप्त हो जाएगा।
स्मरण रखें, इस दुनिया में प्रत्येक व्यक्ति को अगर वास्तविक विकास करना हो तो अपना ही विकास करना होता है, किसी दूसरे का विकास काम में नहीं आ सकता है। किसी दूसरे का किया गया भोजन आपको तृप्ति नहीं देगा और किसी दूसरे के पहने वस्त्र आपके शरीर को नहीं ढकेंगे। किसी दूसरे द्वारा अनुभव किया गया सत्य आपका सत्य नहीं हो सकता है। इस जगत में कोई भी मनुष्य किसी से उधार सत्य को नहीं पा सकता, लेकिन हम सब उधार सत्यों को पाए हुए हैं। हमें सिखाया जाता है कि हम उधार सत्यों को स्वीकार कर लें। हमें निरंतर समझाया जाता है कि हम दूसरों के सत्यों को मान लें, अंगीकार कर लें। हमें संदेह से बचने को कहा जाता है और विश्वास करने को कहा जाता है।
मैं आपसे संदेह करने को कहना चाहूंगा। जिसे भी सत्य जानना हो, उसे संदेह करने का साहस करना होता है। और संदेह इस जगत में सबसे बड़ा साहस है। स्मरण रखें, जब मैं कह रहा हूं संदेह करना पड़ता है तो यह नहीं कह रहा हूं कि अविश्वास करें। अविश्वास भी विश्वास का ही एक रूप है। जो आदमी कहता है, मैं ईश्वर को मानता हूं, एक विश्वास है। जो आदमी कहता है, मैं ईश्वर को नहीं मानता, यह भी एक विश्वास है। जो आदमी कहता है, आत्मा है, यह भी एक विश्वास है, जो आदमी कहता है, आत्मा नहीं है, यह भी एक विश्वास है। यह दोनों ही विश्वास हैं।
आस्था और अनास्था, श्रद्धा और अश्रद्धा, सब श्रद्धा के रूपांतर हैं। दोनों ही स्थिति में हम दूसरे लोगों को मान लेते हैं, खुद खोज नहीं करते हैं। संदेह का अर्थ है, न श्रद्धा, न अश्रद्धा। संदेह का अर्थ है, न स्वीकार, न अस्वीकार। संदेह का अर्थ है जिज्ञासा। संदेह का अर्थ है, मैं जानता हूं, क्या है? मैं जानना चाहता हूं, सत्य क्या है? और जब तक कोई व्यक्ति सजग न हो, इस सत्य के प्रति कि मुझे जानना है कि सत्य क्या है, तब तक उसकी स्वीकृतियां, उसकी श्रद्धाएं, उसके विश्वास उसे कहीं भी ले जाने में समर्थ नहीं होंगे.
-ओशो

9821930548
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