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    कब मिटीहों, कब पाहिहों पूरन परमानंद - ओशो

    kab miteehon, kab paahihon pooran paramaanand - osho


    कब मिटीहों, कब पाहिहों पूरन परमानंद - ओशो 

            तुम्हें शायद कभी अंदाज हुआ हो अगर तुम किसी यात्रा पर गए हो, जब तुम मंजि ल के बिलकुल करीब पहुंच जाते हो, तब जितनी दूर मालूम पड़ती है, उतनी दूरी पहले कदम पर भी नहीं मालूम पड़ी थी जब मंजिल बिलकुल करीब होती है, जब अब मिले, अब मिले, तब क्षण भर का भी फासला अत्यंत कष्टपूर्ण हो जाता है। मंजल जब बिलकुल आंख के सामने आ जाती है, तब जरा सी भी दूरी खलती है। भक्त ने सब दे दिया, लेकिन अभी शरीर में है। इसलिए बुद्ध ने मोक्ष के दो भेद ि कए हैं। जैसा कि भारत में सदा किए गए हैं। मुक्त व्यक्ति को हम जीवित मुक्त क हते हैं। जीवन मुक्त का अर्थ है-अभी वह जीवित है। शरीर में है मुक्त हो गया। भीतर से सब बंधन टूट गए, लेकिन शरीर की यात्रा अभी जारी है। शायद कुछ समय और लगेगा जब शरीर भी गिर जाएगा और मिलन परिपूर्ण होगा। इतना सा फासला बाकी है

            ऐसा समझो, कि तुम ऐसे व्यक्ति हो, एक घड़ा है भरा हुआ, घाट पर खा है नदी से दर भक्त ऐसा घड़ा है, नदी में आ गया, भीतर भी पानी है जैसे मिट्टी की जर । सी देह रह गई है। मिट्टी की देह भी पोरस है, छिद्रवाली है। पानी थोड़ा आता जा ता है। लेकिन फिर भी देह बाकी है। यही विरह है नदी में घड़ा है, बाहर जल, भ तर जल वही जल बाहर, वही भीतर है फिर भी घड़े की पतली सी मिट्टी की ल कीर मिट्टी की ही लकीर है, लेकिन है इतना सा फासला रह गया तब विरह पैद | होता है तब नित प्रतिपल एक ही विरह रहता है, कि कैसे यह भीतर जाए? कब? 

            कबीर ने कहा है, कि मरूंगा? कब मिटुंगा, कि पूर्ण परमानंद उपलब्ध हो जाएं? कब मिटीहों, कब पाहिहों पूरन परमानंद जरा सी कमी है बाल भर फासला है। को ई बड़ी दीवाल नहीं मिट्टी की दीवाल है वह भी छिद्रवाली है उससे भी पानी आ ता जाता है। लेकिन फिर भी है। ध्यान रखना, जब तक तुम्हें स्वाद नहीं लगा तब तक तुम्हें विरह का पता ही न च लेगा तब तक तुम्हें मिलन का ही स्वाद नहीं, विरह को तुम जानोगे कैसे? तब त क तुम जी रहे हो लेकिन तुम्हारे भीतर वह प्यास नहीं उठी, जो तुम्हें विरह से भ र दे। विरह की अग्नि नहीं उठी तुम छोटे बच्चों की भांति हो, जो अभी किसी के प्रेम में नहीं पड़े।

     - ओशो 

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