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    निराकार के ध्यान की विधि - ओशो

    Method-of-Meditation-on-the-Formless-Osho


    निराकार के ध्यान की विधि - ओशो 

    क्या निराकार वस्तु का ध्यान हो सकता है? और यदि हो सकता है, तो क्या निराकार निराकार ही बना रहेगा?

    ध्यान का साकार या निराकार से कोई भी संबंध नहीं है। और न ध्यान का विषय-वस्तु से ही कोई संबंध है। ध्यान है विषय-वस्तु-रहितता—प्रगाढ़ निद्रा की भांति। लेकिन, निद्रा में चेतना नहीं है— और ध्यान में चेतना पूर्णरूपेण है। अर्थात निद्रा अचेतन-ध्यान है, या ध्यान सचेतन-निद्रा है। प्रगाढ़ निद्रा में भी हम वहीं होते हैं, जहां ध्यान में होते हैं लेकिन, मूछित। ध्यान में भी हम वहीं होते हैं, जहां निद्रा में होते हैं लेकिन, जाग्रत। ___जागते हुए सोना ध्यान है। या सोते हुए जागना ध्यान है। फिर जो जाना जाता है, वह न आकार है, न निराकार है। वह है आकार में निराकार, या निराकार में आकार। असल में वहां द्वंद्व नहीं है, द्वैत नहीं है। और, इसलिए हमारे सब शब्द व्यर्थ हो जाते हैं। वहां न ज्ञाता है, न ज्ञेय है; न दृश्य है, न द्रष्टा है। इसलिए, वहां जो है, उसे कहना असंभव है। कठिन नहीं, असंभव है।

    ध्यान है मन की मृत्यु, और भाषा है मन की अधागिनी। वह मन के साथ ही सती हो जाती है। वह विधवा होकर जीना नहीं जानती है। जाने, तो जी नहीं सकती है। और उसका पुनर्विवाह भी नहीं हो सकता है। क्योंकि मन के पार जो है, वह उससे विवाह के लिए चिर-अनुत्सुक है। उसका विवाह हो ही चुका है— शून्यता से।

    - ओशो 

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